अपने फैसले में, जस्टिस कल्याण राय सुराना और जस्टिस शमीमा जहान की डिवीजन बेंच ने कहा कि कंप्यूटर से बने NRC लेगेसी डेटा पर तब तक भरोसा नहीं किया जा सकता, जब तक कि उसके साथ एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 65B के तहत जरूरी सर्टिफिकेट न हो. यह धारा इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड्स को सबूत के तौर पर स्वीकार करने के नियमों को तय करती है.
असम NRC का काम 2019 में पूरा हो गया था, लेकिन इसे अभी तक नोटिफाई नहीं किया गया है. यह तय करने के लिए एक अहम दस्तावेज होना था कि कौन असली भारतीय नागरिक है और कौन अवैध प्रवासी.
यह मामला अमीनुल हक की याचिका से जुड़ा था, जिन्होंने गुवाहाटी के फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के 28 फरवरी 2019 के उस आदेश को चुनौती दी थी जिसमें उन्हें विदेशी घोषित किया गया था.
इस मामले में, पहले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल और बाद में हाई कोर्ट में, हक ने दावा किया कि उनका परिवार पीढ़ियों से असम में रह रहा है. अपने दावे के समर्थन में उन्होंने 1951 के NRC के हिस्से, 1966 के बाद की वोटर लिस्ट, 1973 की जमीन की बिक्री का डीड, अपना PAN कार्ड, EPIC, स्कूल सर्टिफिकेट और परिवार से जुड़े दस्तावेज पेश किए.
हाई कोर्ट ने कहा कि भले ही पूर्वजों के नामों में छोटी-मोटी गलतियां अकेले नागरिकता के दावे को खारिज करने के लिए काफी न हों, लेकिन याचिकाकर्ता की यह जिम्मेदारी थी कि वह पूर्वजों के साथ एक भरोसेमंद और लगातार जुड़ाव साबित करे. साथ ही, यह भी साबित करे कि तय कट-ऑफ तारीख से पहले भारत में उनकी मौजूदगी के लिए मान्य सबूत मौजूद हैं.
बेंच ने कहा, ‘यह बात अच्छी तरह से तय है कि PAN कार्ड और EPIC नागरिकता का सबूत नहीं हैं.’

