बारिश में भी नहीं थमा बौद्ध अनुयायियों का आंदोलन, दीक्षाभूमि विस्तार की मांग हुई तेज

नागपुर: दीक्षाभूमि के सर्वांगीण विकास और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उसके विस्तार की मांग को लेकर शनिवार को नागपुर में हजारों बौद्ध अनुयायी सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने काचीपुरा चौक स्थित कृषि विभाग के कार्यालय का घेराव कर सरकार से दीक्षाभूमि के उत्तर दिशा में स्थित कृषि विभाग की भूमि को दीक्षाभूमि स्मारक समिति के नाम हस्तांतरित करने की मांग की।

मूसलाधार बारिश के बावजूद बड़ी संख्या में महिला, पुरुष, युवा और बुजुर्ग इस आंदोलन में शामिल हुए। खराब मौसम भी प्रदर्शनकारियों के उत्साह को कम नहीं कर सका और उन्होंने शांतिपूर्ण ढंग से अपनी मांग सरकार के सामने रखी।

कृषि विभाग कार्यालय के बाहर किया प्रदर्शन

आंदोलन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने कृषि विभाग के अतिथि गृह के सामने मानव श्रृंखला बनाकर सरकार के प्रति अपनी नाराजगी जताई। बड़ी संख्या में मौजूद बौद्ध अनुयायियों ने दीक्षाभूमि के विस्तार को लेकर शीघ्र निर्णय लेने की मांग की।

प्रदर्शन के बाद आंदोलन के प्रतिनिधिमंडल ने मुख्यमंत्री के नाम एक ज्ञापन सौंपा। यह ज्ञापन मुख्यमंत्री सचिवालय की सहसचिव आशा पठान के माध्यम से सरकार तक पहुंचाया गया।

ज्ञापन में रखी गईं प्रमुख मांगें

प्रदर्शनकारियों ने अपने ज्ञापन में सरकार से कई महत्वपूर्ण मांगें रखीं। उन्होंने मांग की कि दीक्षाभूमि के उत्तर दिशा में स्थित कृषि विभाग की भूमि को तत्काल दीक्षाभूमि स्मारक समिति को हस्तांतरित किया जाए।

इसके अलावा, संबंधित भूमि पर प्रस्तावित निर्माण कार्यों को तत्काल रोका जाए और दीक्षाभूमि के विस्तारीकरण एवं समग्र विकास को लेकर जल्द से जल्द सकारात्मक निर्णय लिया जाए।

आंदोलनकारियों का कहना था कि दीक्षाभूमि का विस्तार केवल एक विकास परियोजना नहीं, बल्कि करोड़ों बौद्ध अनुयायियों की धार्मिक आस्था, सामाजिक अस्मिता और ऐतिहासिक विरासत से जुड़ा विषय है।

आंदोलनकारियों ने दी चेतावनी

प्रदर्शन के दौरान वक्ताओं ने कहा कि यदि सरकार ने उनकी मांगों पर जल्द सकारात्मक निर्णय नहीं लिया, तो आंदोलन को और व्यापक रूप दिया जाएगा। उनका कहना था कि यह संघर्ष किसी एक संगठन का नहीं, बल्कि देश और दुनिया भर के बौद्ध समाज की भावनाओं से जुड़ा हुआ है।

आंदोलनकारियों ने सरकार से अपील की कि इस विषय को संवेदनशीलता के साथ देखते हुए शीघ्र समाधान निकाला जाए, ताकि दीक्षाभूमि के विकास की दिशा में लंबे समय से लंबित मांग पूरी हो सके।

क्यों महत्वपूर्ण है दीक्षाभूमि?

नागपुर स्थित दीक्षाभूमि बौद्ध समाज के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है। वर्ष 1956 में यहीं पर भारत रत्न डॉ. भीमराव आंबेडकर ने अपने लाखों अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म स्वीकार किया था। इसके बाद से यह स्थान देश-विदेश के बौद्ध अनुयायियों के लिए आस्था और प्रेरणा का प्रमुख केंद्र बन गया।

हर वर्ष धम्मचक्र प्रवर्तन दिवस सहित विभिन्न अवसरों पर लाखों श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। बढ़ती श्रद्धालुओं की संख्या को देखते हुए लंबे समय से दीक्षाभूमि के विस्तार, सौंदर्यीकरण और आधुनिक सुविधाओं के विकास की मांग उठती रही है।

कई सामाजिक और धार्मिक संगठन हुए शामिल

इस प्रदर्शन में दीक्षाभूमि बचाओ, विस्तारीकरण एवं सौंदर्यीकरण समिति, भारतीय बौद्ध महासभा, समता सैनिक दल तथा विभिन्न बुद्ध विहार समितियों सहित अनेक सामाजिक और धार्मिक संगठनों के पदाधिकारी एवं कार्यकर्ता शामिल हुए।

आंदोलन में पदमाकर गणवीर, डॉ. एन.वी. ढोके, हर्षल डोंगे, सरोज आगलावे, विशाल वानखेडे, भीमराव फुसे, अमर दीपंकर, राज रक्षित, माया पाटिल, भारती थोटे, वनमाला उके, मंजीर सुटे, वर्षा धारगावे, पुण्य बौद्ध, सरोज डोंगे, कविता लांडगे सहित बड़ी संख्या में बौद्ध अनुयायियों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई।

सरकार के फैसले पर टिकी हैं निगाहें

प्रदर्शन के बाद अब सभी की निगाहें राज्य सरकार के अगले कदम पर टिकी हैं। आंदोलनकारी उम्मीद जता रहे हैं कि सरकार उनकी मांगों पर गंभीरता से विचार करेगी और दीक्षाभूमि के विस्तार से संबंधित निर्णय जल्द लिया जाएगा।

वहीं, यदि मांगों पर शीघ्र कार्रवाई नहीं होती है, तो आंदोलन से जुड़े संगठनों ने भविष्य में और व्यापक स्तर पर आंदोलन तेज करने के संकेत दिए हैं। ऐसे में दीक्षाभूमि विस्तार का मुद्दा आने वाले दिनों में राज्य की महत्वपूर्ण सामाजिक और सार्वजनिक चर्चाओं में शामिल रह सकता है।

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